मानस चिंतन,कह रघुबीर देखु रन सीता। लछिमन इहाँ हत्यो इँद्रजीता।।

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मानस चिंतन,कह रघुबीर देखु रन सीता। लछिमन इहाँ हत्यो इँद्रजीता।।

प्रभु रामजी अपना पराक्रम कभी नहीं कहा- उनकी सदा रीति है कि वे हमेशा किये गए कार्यो का श्रेय गुरु जी, अपने भाइयों को या सेवकों को देते है जब मेघनाथ ने अंतरिक्ष में छिप कर राम की सारी सेना तथा राम लक्ष्मण को बाणो से बेध डाला था।  तब लक्ष्मण जी राम जी से बोले में संसार के समस्त देत्यो का वध करने के लिए बह्रमास्त्र का प्रयोग करना चाहता हूँ। लक्ष्मण जी में यह समर्थ है इसी से रामजी ने उनको समझा कर कहा कि एक के कारण सब का नाश करना उचित नहीं युद्ध के बाद श्री जानकी को रण भूमि दिखाते हुए लक्ष्मण हनुमान अंगद के ऐश्वर्य का ही बखान किया। 


कह रघुबीर देखु रन सीता। लछिमन इहाँ हत्यो इँद्रजीता।।

हनूमान अंगद के मारे। रन महि परे निसाचर भारे।।

अयोध्या आगमन पर रामजी ने युद्ध के जीत का श्रेय गुरु जी को दिया और अपने सभी सहयोगियों विभीषण ,सुग्रीव ,नल ,नील ,अंगद ,जामवंत ,हनुमान सभी से कहा गुरु वशिष्ठ जी हमारे कुल के पूज्य हैं। इन्हीं की कृपा से रण में राक्षस मारे गए हैं। संतो का मत कृपा में दूरी या पास का कोई फर्क नहीं पड़ता।

गुर बसिष्ट कुलपूज्य हमारे। इन्ह की कृपाँ दनुज रन मारे॥

रामजी अपने साथियों का परिचय गुरु वशिष्ठ जी से कराते हुए कहा युद्ध को जीतने में मेरे लिए इन सभी ने जान की बाजी लगा दी। (सूत्र) अक्सर काम पूरा हो जाने के बाद व्यक्ति उन सहयोगियों को भूल ही जाता है जिनकी वजह से उसने सफलता हासिल की इसी कारण आज भी रामजी एक आदर्श के रूप में पूजे जाते है। कृष्णा और राम में यह बहुत बड़ा भेद भी यही है कि भगवान कृष्णा ने कई लीला ऐश्वर्य युक्त है।

ए सब सखा सुनहु मुनि मेरे। भए समर सागर कहँ बेरे॥

वास्तव में कृतज्ञता और कुशल नेतृत्व में राम जी से बड़ा कोई है ही नहीं रामजी ने केवल विजय का श्रेय ही नहीं दिया बल्कि कहा।

तुम्ह अति कीन्हि मोरि सेवकाई। मुख पर केहि बिधि करौं बड़ाई॥
ताते मोहि तुम्ह अति प्रिय लागे। मम हित लागि भवन सुख त्यागे॥

अतः छोटे भाई, राज्य, संपत्ति, जानकी, अपना शरीर, घर, कुटुम्ब और मित्र-ये सभी मुझे प्रिय तो हैं, पर तुम्हारे समान नहीं, ऐसी है रामजी की कृतज्ञता।(मृषा=झूठ मूठ, व्यर्थ) (बाना=स्वभाव,रीति)

अनुज राज संपति बैदेही। देह गेह परिवार सनेही॥
सब मम प्रिय नहिं तुम्हहि समाना। मृषा न कहउँ मोर यह बाना॥

पर शरणागत पालन में राम अदुतीय है इसी से शरणागत में लक्ष्मण का नाम नहीं लिया गया पर निशाचर वध में लक्ष्मण अदुतीय है इसी से इस सम्बन्ध में राम का नाम नहीं लिया गया।

रामजी सुग्रीव को लक्ष्मण जी का ऐश्वर्य बताते हुए कहते है जगत में जितने भी राक्षस हैं, लक्ष्मण क्षण भर में उन सबको मार सकते हैं और यदि विभीषण भयभीत होकर मेरी शरण आया है तो मैं तो उसे प्राणों की तरह रखूँगा।(निमिष=उतना समय  जितना पलक गिरने में लगता है)

जग महुँ सखा निसाचर जेते। लछिमनु हनइ निमिष महुँ तेते।।
जौं सभीत आवा सरनाईं। रखिहउँ ताहि प्रान की नाईं॥

जौं सभीत । सभीत का भाव है कि यदि वह भय से आया तो भय हरेगे,भय चाहे संसार का हो ,चाहे शत्रु का,चाहे पाप का सरनागत मुझे प्राणो के सामान प्रिय है। और शरणागत के लिए तो में प्राण भी दे सकता हूँ।

देह प्रान तें प्रिय कछु नाहीं। सोउ मुनि देउँ निमिष एक माहीं॥

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