मानस चिंतन,अवतार के हेतु,हरि अवतार हेतु जेहि होई। इदमित्थं कहि जाइ न सोई॥

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मानस चिंतन  29 रामचरित मानस

राम अवतार के कारण  
भाव वाले भक्त का, भगवान पर भी भार है।
इसलिए परब्रह्म का, होता यहाँ अवतार हैं।।
जब किसी भक्त का परमात्मा से प्रेम प्रगाण होता है।
तब वो परमात्मा धरती पर आने को लाचार होता है।।

हरि अवतार हेतु जेहि होई। इदमित्थं कहि जाइ न सोई॥

राम जनम के हेतु अनेका। परम बिचित्र एक तें एका॥
तदपि संत मुनि बेद पुराना। जस कछु कहहिं स्वमति अनुमाना॥

कोई भी मुनि एवं आचार्य दृणता पूर्वक यह नहीं कह सकते कि अमुक अवतार काअमुक ही कारण है। एकअवतार के भी अनेक कारण हो सकते है हर अवतार के अलग अलग कारण होते है। इसीलिए एक से एक परम विचित्र कहा, सभी सन्त, मुनि, वेद और पुराण अपनी-अपनी बुद्धि से अवतार का कारण कहते है। 

जब जब होइ धरम कै हानी। बाढहिं असुर अधम अभिमानी।।
करहिं अनीति जाइ नहिं बरनी। सीदहिं बिप्र धेनु सुर धरनी॥ 

हे उमा वेद, पुराण, मुनि और सन्तो इन सभी के साथ साथ मेरा भी मत है कि बहुत समय तक धर्मानुष्ठान चलता रहता है। फिर धीरे धीरे धर्मानुष्ठान करनेवालों के अन्तःकरण में  कामनाओं का विकास होने से अधर्म की उत्पत्ति होती है और धीरे धीरे धर्म कम होकर अधर्म बढ़ने लगता है प्रभु पर आश्रितो को पीड़ा देने वाले अभिमानी असुर बढ़ने लगते है। (अनीति= नीति के विरुद्ध,अन्याय, अत्याचार) (सीदहिं= सीदना=दुख या कष्ट पाना,नष्ट या बरबाद होना, कष्ट झेलना, पीड़ित होना) (पीरा=पीड़ा, दुख) (कृपानिधि= दयासागर)

तब तब प्रभु धरि बिबिध सरीरा। हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा॥
मीन कमठ सूकर नरहरी। बामन परसुराम बपु धरी॥
जब जब नाथ सुरन्ह दुखु पायो। नाना तनु धरि तुम्हइँ नसायो॥

प्रभु आपने ही मत्स्य, कच्छप, वराह, नृसिंह, वामन और परशुराम के शरीर धारण किए।हे नाथ जब जब देवताओं ने दुख पाया,तब-तब अनेकों शरीर धारण करके आपने ही उनके दुखों का नाश किया। (कमठ=कछुआ, साधुओं का तूँबा,कमंडल) (नरहरी=विष्णु का एक नाम,नृसिंह अवतार) (बपु= शरीर,देह, ईश्वर का शरीरधारी रूप, अवतार) भगवान ने कोई एक शरीर धारण नहीं किया प्रभु ने तो कार्य के अनुसार शरीर धारण किये, अतः भगवान को सर्व समर्थ के कारण प्रभु और पीड़ा हरण के कारण कृपा निधि कहा भक्त जन प्रभु के उसी यश को गा-गाकर संसार के भवसागर से पार हो जाते है। 

सोइ जस गाइ भगत भव तरहीं। कृपासिंधु जन हित तनु धरहीं॥

बिप्र धेनु सुर संत हित, लीन्ह मनुज अवतार॥
निज इच्छा निर्मित तनु, माया गुन गो पार॥

तुलसीदास जी ने कहा ब्राम्हण गऊ देवताओ और संत के हितार्थ प्रभु ने मनुष्य अवतार लिया प्रभु का शरीर स्वेच्छा रचित है विप्र धेनु सुर संत ये सभी के सभी राक्षसों द्वारा पीड़ित है।उनका दिव्य शरीर अपनी निज इच्छा से निर्मित होता है अतः भगवान का शरीर किसी कर्म बंधन से परवश होकर त्रिगुणात्मक भौतिक पदार्थों के द्वारा नहीं है जैसा की मनुष्य का होता है। प्रभु का शरीर माया (सत्व रज तम तीनों) गुणों और बाहरी तथा भीतरी इन्द्रियों से परे है। जीव का शरीर माया, गुण, इन्द्रियमय, होता है पर प्रभु का शरीर इन तीनों से परे है। 
ब्राह्मण धर्म के  संस्थापक है। धेनु यज्ञ आदि की सामिग्री में सहयोग करती है गाय के दूध, घी, दही आदि  से यज्ञ, पूजन आदि होते है, गाय बछड़े से जगत का हित करती  है,और देवता पूजा लेकर जगत की रक्षा करते है संत  परोपकारी होते है। और संत तो हमेशा सहज स्वाभाव से ही परहित निरत होते ही है ये सभी रावण से दुखी हुए, (निज इच्छा निर्मित तनु= संकल्प मात्र, शरीर स्वेच्छा रचित है) (सीदहिं=सीदति=दुख पाना,कष्ट झेलना,पीड़ित होना ) (निरत=काम में लगा हुआ, लीन)
भगवान ने स्वयं विभीषण से कहा- हे विभीषण किसी की प्रार्थना सुन कर मैं देह धारण नहीं करता मुझे तो तुम्हारे जैसे संत साधक मुझे प्रिय है। इसी कारण मैं शरीर धारण करता हूँ

तुम सरीके संत प्रिय मोरे ।धरहुं देह नहि आन निहोरे॥

कैसे संत-

सगुन उपासक परहित निरत नीति दृढ़ नेम।
ते नर प्रान समान मम जिन्ह कें द्विज पद प्रेम॥

जो सगुण ब्रह्म के उपासक हैं परोपकार और नीति-में तत्पर हैं, नेम के पक्के ओर जिनका विप्र अर्थात हनुमान जी के चरण में प्रेम है वे मनुष्य मुझे प्राण के समान (प्रिय) है।
भक्त भी तीन तरह के है। राम जी ने स्वयं कहा- 1 साधारण प्रिय, निकृष्ट कोटि वाले 2 अधिक प्रिय, मध्यम कोटि वाले  3 अतिशय वा प्राण समान  प्रिय,उत्तम संत प्राण समान प्रिय।
1 साधारण प्रिय,निकृष्ट कोटि वाले-

जौं नर होइ चराचर द्रोही। आवे सभय सरन तकि मोही।।
तजि मद मोह कपट छल नाना। करउँ सद्य तेहि साधु समाना।।

यह भक्त पूर्व में असाधु था, पर शरण आने से साधु तो नहीं हुआ पर प्रभु की शरणागत के कारण साधु के समान हो गया।

2 अधिक प्रिय, मध्यम कोटि वाले- 

जननी जनक बंधु सुत दारा। तनु धनु भवन सुह्रद परिवारा।।
सब कै ममता ताग बटोरी। मम पद मनहि बाँध बरि डोरी।।
समदरसी इच्छा कछु नाहीं। हरष सोक भय नहिं मन माहीं।।
अस सज्जन मम उर बस कैसें। लोभी हृदयँ बसइ धनु जैसें।

यह निकृष्ट से अच्छा है इसने सभी से  (माता, पिता, भाई, पुत्र, स्त्री, शरीर, धन, घर, मित्र और परिवार) से ममता छोड़कर राम जी के चरणों में प्रेम किया।
3 अतिशय वा प्राण समान प्रिय,उत्तम संत प्राण समान प्रिय- 

सगुन उपासक परहित निरत नीति दृढ़ नेम।
ते नर प्रान समान मम जिन्ह कें द्विज पद प्रेम॥

इनका विप्र अर्थात हनुमान जी में प्रेम देखा गया
विभीषण-सारिखे संत कौन हैं? श्रीशबरीजी, श्री भुशुण्डिजी ,

सुनु लंकेस सकल गुन तोरें। तातें तुम्ह अतिसय प्रिय मोरें॥
नव महुँ एकउ जिन्ह कें होई। नारि पुरुष सचराचर कोई॥

सोइ अतिसय प्रिय भामिनि मोरें। सकल प्रकार भगति दृढ़ तोरें॥
भगतिवंत अति नीचउ प्रानी। मोहि प्रानप्रिय असि मम बानी॥

और बाल्मीक जी ने भगवान से कहा- आपकी देह सचिदानंद मय है विकार रहित है इसको अधिकारी ही जानते है,और प्राकृत (पंच भौतिक देहधारी) राजाओ की तरह आप जो कहते करते हो हे रामजी आप के उस चरित (लीला) को देख कर तथा  सुनकर मूर्ख (आसुरी सम्पदा) वाले मोहित होते है पर बुद्धिमान सुखी होते है। भगवान का चरित तो एक ही है पर जड़ मोहित होते है और बुद्धिमान सुखी होते है। (जड़=मूर्ख) (प्राकृत=स्वाभाविक)

चिदानंदमय देह तुम्हारी। बिगत बिकार जान अधिकारी॥
नर तनु धरेहु संत सुर काजा। कहहु करहु जस प्राकृत राजा॥

इच्छामय नर वेष सँवारे । होइहहुँ प्रकट निकेत तुम्हारे॥
तुम्ह जो कहहु करहु सबु साँचा। जस काछिअ तस चाहिअ नाचा॥

लोकोक्तिय- जैसा काछ काछे वैसा नाच नाचे।अर्थ- जैसा वेश हो उसी के अनुकूल अभिनय  करना चाहिए (काछ=परिधान, पहनावा) (बुध=बुद्धिमान एवं विद्वान व्यक्ति, पंडित) इस कारण 

राम देखि सुनि चरित तुम्हारे। जड़ मोहहिं बुध होहिं सुखारे॥
कलप कलप प्रति प्रभु अवतरहीं। चारु चरित नानाबिधि करहीं॥

कालिका पुराण के अनुसार प्रत्येक कल्प में राम एवं रावण होते है। इस तरह हजारों राम और हजारों रावण हो गये और होने वाले  है, पर रामावतार तो  एक कल्प मे एक ही वार होता है।कल्प भेद के कारण चरित्र में भेद होता है। प्रत्येक कल्प के चरित्र का  मुनि गान करते है।

तब तब कथा मुनीसन्ह गाई। परम पुनीत प्रबंध बनाई।।
बिबिध प्रसंग अनूप बखाने। करहिं न सुनि आचरजु सयाने।।

तुलसीदास जी ने कहा- प्रत्येक कल्प में जब-जब भगवान अवतार लेते हैं और नाना प्रकार की सुंदर लीलाएँ करते हैं, तब-तब मुनीश्वरों ने परम पवित्र काव्य रचना करके उनकी कथाओं का गान किया है। प्रबंध का बनाना ही कथा है,”प्रबंध कल्पना कथा’ प्रबन्ध की कल्पना अर्थात रचना  करते हैं, और वही कथा गाते हैं। ‘परम पुनीत” का भाव कि जो इन प्रबंधों को सुनता या गाता है। वह भी पवित्र हो जाता है। 

हरि अनंत हरिकथा अनंता। कहहिं सुनहिं बहुबिधि सब संता।।

अतः एक रामायण की  कथा दूसरी रामायण से मेल नहीं खाती, प्रसंगों  में अंतर  होता  है। बाल्मीकीय रामायण में एक प्रकार की कथा है, अध्यात्म रामायण मे दूसरे प्रकार की है। अदभुत रामायण में तीसरे प्रकार की और आनन्द रामायण में चौथे प्रकार की कथा है। अतः समझदार व्यक्ति आश्चर्य नहीं करते क्योकि श्री हरि अनंत है।  (उनका कोई पार नहीं पा सकता) और उनकी कथा भी अनंत है। सब संत लोग उसे बहुत प्रकार से कहते-सुनते हैं। जैसे हरि है वैसे ही उनकी कथा है यथाः

जथा अनंत राम भगवाना। तथा कथा कीरति गुन नाना॥

रामायण का अंत नहीं पाते चाहे करोडो कल्पो तक क्यों ना गावे यथाः

रामचंद्र के चरित सुहाए। कलप कोटि लगि जाहिं न गाए॥
महिमा नाम रूप गुन गाथा। सकल अमित अनंत रघुनाथा॥
निज निज मति मुनि हरि गुन गावहिं।निगम सेष सिवपार न पावहिं।

नाना प्रकार से राम के अवतार हुए है और सौ करोड़ तथा अपार रामायणें है। कल्पभेद के अनुसार हरि के सुंदर चरित्रों को मुनीश्वरों ने कई  प्रकार से गाया है।

नाना भाँति राम अवतारा। रामायन सत कोटि अपारा।।
कलपभेद हरिचरित सुहाए। भाँति अनेक मुनीसन्ह गाए।।

वशिष्ठजी ने कहा रामजी सत्य प्रतिज्ञ है और वेद की मर्यादा के रक्षक हैं। श्री रामजी का अवतार ही जगत के कल्याण के लिए हुआ है। वे गुरु, पिता और माता के वचनों के अनुसार चलने वाले है। दुष्टों के दल का नाश करने वाले और देवताओं के हितकारी है। (सत्यसंध=सत्यप्रतिज्ञ, वचन को पूरा करनेवाला)

सत्यसंध पालक श्रुति सेतू। राम जनमु जग मंगल हेतु॥
गुर पितु मातु बचन अनुसारी। खल दलु दलन देव हितकारी॥

जब जब होई धरम कै हानी। बाढ़हिं असुर अधम अभिमानी॥

प्रभु के अवतार के लिए कोई काल का नियम नहीं है जब भी धर्म कि हानि होती है, तभी अवतार होता है इससे जनाया कि प्रभु सदैव धर्म की रक्षा करते है। अधम अभिमानी असुरो की बाढ़ उनकी उन्नति ही प्रभु के अवतार का मुख्य कारण है।(अधम अभिमानी=अर्थात प्रभु के आश्रित को पीड़ा देने वाले) 
धर्म की हानि कैसे?

जेहि बिधि होइ धर्म निर्मूला। सो सब करहिं बेद प्रतिकूला॥
जेहिं जेहिं देस धेनु द्विज पावहिं। नगर गाउँ पुर आगि लगावहिं॥

करहिं अनीति जाइ नहिं बरनी। सीदहिं बिप्र धेनु सुर धरनी॥
अतिसय देखइ धर्म की ग्लानि। परम सभीत धरा अकुलानी।।

देखत जग्य निसाचर धावहिं। करहिं उपद्रव मुनि दु:ख पावहिं॥
जब जब नाथ सुरन्ह दुखु पायो। नाना तनु धरि तुम्हइँ नसायो॥

तब तब प्रभु धरि विविध सरीरा। हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा ।।

(ग्लानि=अरुचि,अनास्था)
रावण  मन ही मन विचार करने लगा- देवता, मनुष्य, असुर, नाग और पक्षियों में कोई ऐसा नहीं, जो मेरे सेवक को भी पा सके। खर-दूषण तो मेरे ही समान बलवान थे। उन्हें भगवान के सिवा और कौन मार सकता है? देवताओं को आनंद देने वाले और पृथ्वी का भार हरण करने वाले भगवान ने ही यदि अवतार लिया है, तो मैं जाकर उनसे हठपूर्वक वैर करूँगा और प्रभु के बाण (के आघात) से प्राण छोड़कर भवसागर से तर जाऊँगा।

सुर नर असुर नाग खग माहीं। मोरे अनुचर कहँ कोउ नाहीं।।
खर दूषन मोहि सम बलवंता। तिन्हहि को मारइ बिनु भगवंता।।

सुर रंजन भंजन महि भारा। जौं भगवंत लीन्ह अवतारा।।
तौ मै जाइ बैरु हठि करऊँ। प्रभु सर प्रान तजें भव तरऊँ।।

होइहि भजनु न तामस देहा। मन क्रम बचन मंत्र दृढ़ एहा।।

राम जी ने विभीषणजी से कहा- हे लंकापति!सुनो,तुम्हारे अंदर उपर्युक्त सब गुण हैं। इससे तुम मुझे अत्यंत ही प्रिय हो।

तुम्ह सारिखे संत प्रिय मोरें। धरउँ देह नहिं आन निहोरें॥
सुनु लंकेस सकल गुन तोरें। तातें तुम्ह अतिसय प्रिय मोरें।।

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