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सुमिरत हरिहि श्राप गति बाधी। सहज बिमल मन लागि समाधी॥

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सुमिरत हरिहि श्राप गति बाधी। सहज बिमल मन लागि समाधी॥
सुमिरत हरिहि श्राप गति बाधी। सहज बिमल मन लागि समाधी॥

सुमिरत हरिहि श्राप गति

अवतार के हेतु, कैलाश पर्वत तो पूरा ही पावन है पर जहाँ जहाँ गंगा जी बहती है, वह जगह अति पावन है। आश्रम पविन्र होनेका लक्षण यह है कि वहाँ पहुँचते ही स्वतः परम आनंद उत्पन्न हो जाता है (पावन= पवित्र, शुद्ध) (गुहा= गुफा) (सुरसरि=गंगा) 


हिमगिरि गुहा एक अति पावनि। बह समीप सुरसरी सुहावनि॥

सुमिरत हरिहि श्राप गति बाधी। सहज बिमल मन लागि समाधी॥

प्रकृति की शोभा देखकर उसके रचयिता अर्थात भगवान  के चरणों मे अनुराग हुआ। गंगाजी भी भगवान के चरणों से प्रकट हुई है, अतः गंगाजी को देखकर भगवान के चरणों में अनुराग हो गया। हरि के स्मरण से नारद जी को जो श्राप दक्ष ने दिया था कि तुम एक स्थल पर दो घड़ियों से अधिक न ठहर सकोगे, तुम्हारा समय तीनों लोकों में घूमते ही बीतेगा। विधान तो देखो महात्मा को गृहस्थ का श्राप लग गया। (सूत्र) एकान्त रमणीक स्थान देख कर भक्तों के मन में भजन करने की इच्छा होती है, पर विषयी लोगों में कामोद्दीपन की इच्छा होती है।

वह श्राप भी नष्ट हो गया,और नारद जी कहने लगे।

श्री  मन नारायण नारायण नारायण॥

हरि नारायण नारायण नारायण॥ 

लक्ष्मी नारायण नारायण नारायण॥ 

श्री मन नारायण नारायण नारायण॥ 

हरि नारायण नारायण नारायण॥ 

सत्य नारायण नारायण नारायण॥ 

ब्रह्मा नारायण नारायण नारायण॥ 

श्री मन नारायण नारायण नारायण॥ 

विष्णु नारायण नारायण नारायण ॥

राम नारायण, नारायण नारायण ॥

श्याम नारायण नारायण नारायण॥ 

चंदा नारायण नारायण नारायण॥ 

सूरज नारायण नारायण नारायण॥ 

श्री मन नारायण नारायण नारायण॥ 

श्री मन  नारायण नारायण नारायण॥ 

सुमिरत हरिहि श्राप गति बाधी। सहज बिमल मन लागि समाधी॥

मुनि गति देखि सुरेस डेराना। कामहि बोलि कीन्ह सनमाना।।
सहित सहाय जाहु मम हेतू। चकेउ हरषि हियँ जलचरकेतू।।

इन्द्र को भारी तपस्वियों हमेशा भय रहता है। नारद जी की ध्यान अवस्था इतनी अधिक थी, कि इन्द्र देव भी डर गये। जब  इन्द्र ने देखा कि नारद जी पर दक्ष के श्राप का प्रभाव समाप्त हो गया और समाधि को देखकर इंद्र कोअपने लोक की चिंता हो गई कीअब मेरा स्थान सुरक्षित नहीं है।  मुनि के समर्थ को देख कर  इन्द्र डरा कि नारद जी ने अपने भजन के प्रभाव से दक्ष के श्राप को  दूर कर दिया तब हमारी अमरावती को ले लेना नारदजी कौन सा कठिन है यह तो इनके बाएँ हाथ का खेल है।

काम कला कछु मुनिहि न ब्यापी। निज भयँ डरेउ मनोभव पापी।।
सीम कि चाँपि सकइ कोउ तासु। बड़ रखवार रमापति जासू।।

काम ने शंकरजी की समाधि भंग कर दी पर नारदजी की समाधि ना छुड़ा सका, इस शंका का समाधान यह कि नारद जी की रक्षा के लिए रमापति मौजूद है और वहाँ तो भगवान की इच्छा थी कि जब समाधि भंग होगी तभी शिवजी का विवाह संभव है।

भयउ न नारद मन कछु रोषा। कहि प्रिय बचन काम परितोषा।।
नाइ चरन सिरु आयसु पाई। गयउ मदन तब सहित सहाई।।

मुनि सुसीलता आपनि करनी। सुरपति सभाँ जाइ सब बरनी।।
सुनि सब कें मन अचरजु आवा। मुनिहि प्रसंसि हरिहि सिरु नावा।।

नारद जी ने कहा-हे कामदेव इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं है, यह तो तुमने इन्द्र की प्रेरणा से किया है अपराध पर क्रोध न करना शील है, ऊपर से  प्रिय वचन कहना  सुशील है, इस स्वभाव को सुशीलता कहते है। (मदन= कामदेव, काम) 

कामदेव ने कहा त्रिलोक्य में आपके समान कोई दूसरा नहीं है। काम क्रोध लोभ को जीतने वाला भगवान के समान है। 

नारि नयन सर जाहि न लागा। घोर क्रोध तम निसि जो जागा॥
लोभ पाँस जेहिं गर न बँधाया। सो नर तुम्ह समान रघुराया॥

कामदेव चलते समय चरणों में सिर नवाकर आज्ञा पाकर चल। कामदेव ने इन्द्र की सभा में मुनि की सुशीलता और अपनी करनी (करतूत) का वर्णन किया, सभी देवताओं ने कहा काम क्रोध से वचना असंभव सा है। इंद्र की सभा में सभी ने नारद जी की प्रशंसा कि तीनों लोकों में जो कोई नहीं कर सका वह नारद जी ने किया, अर्थात इन्होंने त्रैलोक्य को जीत लिया। सभा में ऐसे भक्तवासल्य भगवान को सभी ने प्रणाम किया। (परितोषा=समाधान संतुष्ट खुश करना) (सुसीलता=सुन्दर स्वाभाव, कोई कैसा भी अपराधी हो पर उस पर रोष ना करके छमा करना)

पर नारद जी तो  भगवान की ही कृपा से बचे। सभी ने भगवान को धन्यवाद दिया और  कहा हे प्रभु यह आपकी कृपा  से हुआ। 

यह गुन साधन ते नहिं होई । तुम्हरी कृपा पाव कोइ कोई।।

नारद जी ने विचार किया कि कामदेव ने इन्द्र की सभा में सभी देवताओं को तो बता ही दिया है जाकर कहने का कुछ प्रयोजन नहीं रह गया। ब्रह्मा विष्णु महेश को मालूम नही है, उनको भी तो बताना जरूरी है, अतः नारद जी सबसे पहले शिवजी के पास गए क्योंकि शिव अहंकार ही है।

अहंकार सिव बुद्धि अज मन ससि चित्त महान।
मनुज बास सचराचर रूप राम भगवान॥

नारद जी ने आज तो शिव जी को प्रणाम भी नहीं किया अब नारद जी अपने को शिव जी से अधिक मानते  है,क्योकि अभी तक तो  काम को जीतने वाले केवल शंकर जी थे। शिवजी ने काम को क्रोध से भस्म कर दिया पर मुझे तो क्रोध भी नहीं आया अतः मेरा प्रभाव उनसे अधिक हो गया, अब में  शिवजी से एक स्टेप आगे हूँ।  

तब नारद गवने सिव पाहीं। जिता काम अहमिति मन माहीं।।
मार चरित संकरहिं सुनाए। अतिप्रिय जानि महेस सिखाए।।

नारद जी सोचे काम सब कला करके मुझ से हार गया, अन्त में मेरे सामने प्रणत हुआ। शिवजी जी तो सदा से कामारि नाम से ख्याति है। उन्होने काम को भस्म कर दिया वो भी काम को प्राणत (हरा) नहीं सके। नारद जी को अभिमान इस बात का भी है  कि शिवजी मोहिनी स्वरूप देख काम को न रोक सके थे ब्रह्मा विष्णु भी कामजित नहीं कहे जा सकते, ब्रह्मा सरस्वती के पीछे दौड़े थे, विष्णु लक्ष्मी को छोड़ नहीं सकते, और विष्णु  ने तो भृगु परीक्षा में क्रोध ही जीता है। अतः इंद्र सभा में कामदेव ने सत्य कहा की त्रिलोक में मेरे बराबर कोई भी नहीं है।

अहंकार ने नारद जी की बुद्धि ऐसी घुमाई दी कि राम चरित  का ठीक उलटा  मार चरित आज उनके मुख से गाया जा रहा है। काम तो तपस्वियों का शत्रु है काम को जलना ही पड़ता है, काम के  प्रणत होने पर ही नारद जी की यह दशा हुई। (प्रणत=झुका हुआ, नम्र, विनीत,दास नौकर, सेवक) (अहमिति=अहं इति, मै,मैंने काम को जीत लिया, मेरे बराबर त्रैलोक में कोई  दूसरा नहीं) (गवने=गए) (मार=काम) 

शंका काम को तो शिवजी ने जला दिया था, फिर नारदजी के साथ का यह कैसे हुआ  समाधान- यथा

कलपभेद हरिचरित सुहाए। भाँति अनेक मुनीसन्ह गाए॥

जो नारद जी हमेशा राम चरित गाते थे। 

गावत राम चरित मृदु बानी। प्रेम सहित बहु भाँति बखानी॥
बार बार नारद मुनि आवहिं। चरित पुनीत राम के गावहिं।।
यह बिचारि नारद कर बीना। गए जहाँ प्रभु सुख आसीना॥ 

जहाँ राम तहँ काम नहिं, जहाँ काम नहिं राम ।
तुलसी कबहूँ होत नहिं, रवि रजनी इक ठाम ।। 

और सुना भी तो किसको रहे है जो  राम चरित मानस के रसिक शिवजी को जो कैलाश को छोड़ कर अगस्त मुनि के आश्रम में राम चरित सुनने जाते थे और कभी कभी हंस रूप से कागभुसुंडि जी के पास सुनने जाते थे। 

रामकथा मुनिबर्ज बखानी। सुनी महेस परम सुखु मानी॥ 

नारद जी शिव जी को काम कथा सुनते है। 

मार चरित संकरहिं सुनाए। अतिप्रिय जानि महेस सिखाए।।

प्रभु को अभिमान नहीं भाता जब काम देव को अभिमान हुआ कि नारद हमारे सामने क्या है तब भगवान ने उसे हरा दिया, और जब नारद को अभिमान हुआ तब नारद को हरा दिया।

सुनहु राम कर सहज सुभाऊ। जन अभिमान न राखहिं काऊ॥ 

शिव जी ने कहा 

बार बार बिनवउँ मुनि तोहीं। जिमि यह कथा सुनायहु मोहीं।।
तिमि जनि हरिहि सुनावहु कबहूँ। चलेहुँ प्रसंग दुराएडु तबहूँ।।

(दुराना= छिपाना) 

संभु दीन्ह उपदेस हित नहिं नारदहि सोहान।
भारद्वाज कौतुक सुनहु हरि इच्छा बलवान।।

परन्तु भगवान की  माया से मोहित होने के कारण शिवजी का यह उपदेश नारदजी को अच्छा नहीं लगा। शिव जी ने तो नारद जी से हित की बात कही पर नारदजी यह समझे कि हमारी बड़ाई इनको सहन नहीं हो रही , इनके हृदय  में इर्षा  है। शिव जी  नहीं चाहते कि दूसरा कोई काम विजय में प्रसिद्ध  हो, ये मेरा उत्कर्ष नहीं देख सकते।

यग्वालिक जी  हे भरद्वाज यह तुम्हारे दादा गुरु की कथा है। 

क्योंकि बाल्मीक जी नारद जी के शिष्य है भरद्वाज जी बाल्मीक जी के शिष्य है उनको भी मोह हुआ था, अतः सावधान होकर सुनो। (ईर्ष्या=मत्सर,डाह)  (उत्कर्ष=ऊपर खींचना,उन्नति) (कौतुक=कुतूहल, आश्चर्य, विनोद,खेल-तमाशा) 

काम, क्रोध, लोभ और अहंकार ये सभी एक दुसरे के भाई है। एक हार जाता है तो दूसरा लड़ने को पहुँच जाता है, काम पराजित हुआ तो नारद जी को अहंकार ने घेर लिया अब अहंकार नारद जी की दुर्दशा  करायेगा। (सूत्र) एक अकेला अहंकार ही नर्क की यात्रा कराने के लिए पर्याप्त है। 

एक बार करतल बर बीना। गावत हरि गुन गान प्रबीना।।
छीरसिंधु गवने मुनिनाथा। जहँ बस श्रीनिवास श्रुतिमाथा।।

हरषि मिले उठि रमानिकेता। बैठे आसन रिषिहि समेता।।
बोले बिहसि चराचर राया। बहुते दिनन कीन्हि मुनि दाया।।

भगवान के दर्शन करने से दास (भक्त) को हर्ष होता है, ठीक वैसे ही दास के मिलने पर भगवान हर्ष होता है। भगवान ब्राह्मणों का मान करते हैं इसी लिए रमानिकेत है, रमा सदा यही बसती हैं, कभी इन्हें छोड़ती नहीं। (सूत्र) साधु के अनादर से, उनका अपमान करने से लक्ष्मी का नाश होता है। स्वामी के बराबर आसन पर दास को नहीं बैठना चाहिए। नारद जी ने सोचा कि भगवान भी हमको बराबर का मानते हैं तभी तो साथ बैठाल रहे हैं। हँसी भगवानकी माया है भगवान के हँसते ही माया का विस्तार हो जाता है। जब-जब माया का कौतुक करना  होता है. तब तब प्रभु हँसे है। हँसते ही कौसल्या अंबा, महामुनि विश्वामित्र, वाल्मीकिजी तथा भुशुण्डिजी आदि माया से मोहित हुये। (रमानिकेता= श्री जी का निवास स्थान) 

काम चरित नारद सब भाषे। जद्यपि प्रथम बरजि सिवँ राखे।।
अति प्रचंड रघुपति कै माया। जेहि न मोह अस को जग जाया।।

नारद कहेउ सहित अभिमाना। कृपा तुम्हारि सकल भगवाना।।
करुनानिधि मन दीख बिचारी। उर अंकुरेउ गरब तरु भारी।।

अहंकारी को  प्रशंसा बहुत ही प्रिय  है, और जो प्रशंसा न करके उल्टी सुनाता है, या  विरुद्ध कहता है वह उसको मत्सरी और द्वेषी  लगता है। नारद जी गलती से  काम को जीतने का अहंकार पाल बैठे थे कि हमने  जीता है। सामान्य तौर पर लोगो को अभिमानी का अभिमान सुन कर क्रोध आता है पर नारद जी तो भगवान के दास होने के कारण भगवान को नारद जी पर दया आई। 

यदि वे अभिमान सहित न कहते तो कृपा तुम्हारि सकल भगवाना’ यह सब आपकी कृपा से है, इसमें  मेरा कोई भी योगदान नहीं है कहने से ही सारी समस्या का समाधान हो जाता जैसे हनुमान जी ने राम जी से कहा।  

सो सब तव प्रताप रघुराई। नाथ न कछू मोरि प्रभुताई॥

मुनि कर हित मम कौतुक होई। अवसि उपाय करबि मै सोई।।
तब नारद हरि पद सिर नाई। चले हृदयँ अहमिति अधिकाई।।

नारदजी द्वारा  कामचरित सुन कर भगवान ने नारद जी की  प्रशंसा करी नारद सोचने लगे कि हरि ने ठीक कहा त्रिदेव तो गृहस्थ है, उनमें  काम को जीतने का समर्थ कहाँ ?

भगवान ने कहा पहले  मुनि का हित होगा अर्थात मुनि का अभिमान दूर होगा, फिर मुनि  क्रोध के कारण मुझे श्राप देंगे तब मेरी  लीला होगी। जिस रास्ते से नारदजी  जा रहे थे उसी रास्ते पर पल भर में माया ने चार सौ कोस का वैकुण्ठ से भी अधिक सुन्दर नगर बना  दिया। 

आनि देखाई नारदहि भूपति राजकुमारि।
कहहु नाथ गुन दोष सब एहि के हृदयँ बिचारि।।

नारदजी के रास्ते में  बड़ा सुन्दर ही नगर पड़ा।  नारदजी ने इसे कभी नहीं देखा था हरि की माया स्वयं राजा की बेटी विस्व मोहिनी बनी जिसका सौन्दर्य  देखकर लक्ष्मी भी मोहित हो जाय। राजा ने राजकुमारी को नारद जी को  दिखाया। और कहा हे नाथ आप मन मे विचार करके इसके गुणदोष बताये।

देखि रूप मुनि बिरति बिसारी। बड़ी बार लगि रहे निहारी।।
लच्छन तासु बिलोकि भुलाने। हृदयँ हरष नहिं प्रगट बखाने।।

विश्व मोहिनी के रूप देखकर तो मुनि जी वैराग्य भूल  गये, और उसके लक्षण देखकर तो अपने को ही भूल गये बड़ी देर तक देखते रह्‌ गये। 

जो एहि बरइ अमर सोइ होई। समरभूमि तेहि जीत न कोई।।
सेवहिं सकल चराचर ताही। बरइ सीलनिधि कन्या जाही।।

विस्व मोहिनी से जिसका विवाह होगा वह अमर होगा  संग्राम भूमि में कोई उसे जीत न सकेगा। उसकी सेवा चराचर जगत करेगा। इसका सीधा सीधा अर्थ शीलनिधि की कन्या को अमर, अजेय  और  चराचर से सेव्य वर मिलेगा। पर मुनि जी माया के कारण सोचने लगे यदि मेरा व्याह इससे हो जाय तो में अमर, अजेय और चराचर से सेव्य हो जाऊंगा। 

लच्छन सब बिचारि उर राखे। कछुक बनाइ भूप सन भाषे।।
सुता सुलच्छन कहि नृप पाहीं। नारद चले सोच मन माहीं।।

करौं जाइ सोइ जतन बिचारी। जेहि प्रकार मोहि बरै कुमारी।।

जप तप कछु न होइ तेहि काला। हे बिधि मिलइ कवन बिधि बाला।।

मैं जाकर सोच-विचारकर अब वही उपाय करूँ, जिससे यह कन्या मुझे ही वरे। में मानता हूँ कि यज्ञ कामधेनु है और तप से सब कुछ संभव है पर इसमें समय लगेगा पर विवाह में समय इतना कम है अतः  इस समय जप-तप यज्ञ से तो कुछ हो नहीं सकता। हे विधाता! मुझे यह कन्या किस तरह मिलेगी?

 

मोरें हित हरि सम नहिं कोऊ। एहि अवसर सहाय सोइ होऊ।।
बहुबिधि बिनय कीन्हि तेहि काला। प्रगटेउ प्रभु कौतुकी कृपाला।।

तोहि सम हित न मोर संसारा। बहे जात कइ भइसि अधारा।।

नारद जी ने कहा मेरे पास तो इतना समय भी नहीं कि श्री हरि को खोजता फिरू इतना तो अवश्य जनता हूँ कि श्री हरि के समान मेरा हित करने वाला कोई नहीं है, इसलिए इस समय वे ही मेरे सहायक हो उस समय नारद जी ने भगवान की बहुत प्रकार से विनती की। तब लीलामय कृपालु प्रभु (वहीं) प्रकट हो गए।

आपन रूप देहु प्रभु मोही। आन भाँति नहिं पावौं ओही।।
जेहि बिधि नाथ होइ हित मोरा। करहु सो बेगि दास मैं तोरा।

काम पीड़ित मोहान्ध से नारद को आज कुछ भी समझ में नहीं आ रहा नारदजी का पतन यहाँ तक पहुँच गया। ये वही नारद मुनि  है जिनके लिये भगवान ने गीता में कहा है कि देवऋषिओ  में नारद मैं हूँ ।हे प्रभो! आप अपना रूप मुझको दीजिए और किसी अन्य  प्रकार से  मैं उस (राजकन्या) को नहीं पा सकता , हे नाथ जिस तरह मेरा हित हो, आप वही शीघ्र कीजिए। मैं आपका दास हूँ। 

जेहि बिधि होइहि परम हित नारद सुनहु तुम्हार।
सोइ हम करब न आन कछु बचन न मृषा हमार।।

माया बिबस भए मुनि मूढ़ा। समुझी नहिं हरि गिरा निगूढ़ा।।
गवने तुरत तहाँ रिषिराई। जहाँ स्वयंबर भूमि बनाई।।

मुनि हित कारन कृपानिधाना। दीन्ह कुरूप न जाइ बखाना।।
सो चरित्र लखि काहुँ न पावा। नारद जानि सबहिं सिर नावा।।

यहाँ नारद जी के तीन रूप हैं  एक तो विष्णु रूप जो केवल नारद जी को ही दिखाई पड़ता है  दूसरा उनका स्वयं का रूप इसी से वे सभा समाज भर को नारद रूप में दिखाई और सभी  ने उनको प्रणाम किया । तीसरा हरि अर्थात वानर रूप यह रूप दोनों  गणों और राज कुमारी  को दिखाई पड़ा दूसरा न लख (समझ) सके। यह भगवान की कृपा है यदि सब देख लेते होते तो सभी हँसते, नारद जी की बड़ी अप्रतिष्ठा होती, सारी लीला ही बिगड़ जाती।

धरि नृपतनु तहँ गयउ कृपाला। कुअँरि हरषि मेलेउ जयमाला।।
दुलहिनि लै गे लच्छिनिवासा। नृपसमाज सब भयउ निरासा।।

तब हर गन बोले मुसुकाई। निज मुख मुकुर बिलोकहु जाई।।
बेषु बिलोकि क्रोध अति बाढ़ा। तिन्हहि सराप दीन्ह अति गाढ़ा।।

देहउँ श्राप कि मरिहउँ जाई। जगत मोरि उपहास कराई॥
बीचहिं पंथ मिले दनुजारी। संग रमा सोइ राजकुमारी॥

बोले मधुर बचन सुरसाईं। मुनि कहँ चले बिकल की नाईं॥
सुनत बचन उपजा अति क्रोधा। माया बस न रहा मन बोधा॥

पर संपदा सकहु नहिं देखी। तुम्हरें इरिषा कपट बिसेषी।।
मथत सिंधु रुद्रहि बौरायहु। सुरन्ह प्रेरी बिष पान करायहु।।

बंचेहु मोहि जवनि धरि देहा। सोइ तनु धरहु श्राप मम एहा॥
कपि आकृति तुम्ह कीन्हि हमारी। करिहहिं कीस सहाय तुम्हारी॥

मम अपकार कीन्ह तुम्ह भारी। नारि बिरहँ तुम्ह होब दुखारी॥

(दनुजारी=दनुजों के शत्रु,विष्णु) (सुरसाईं=विष्णु) (विकल= व्याकुल, परेशान,असमर्थ)
(बंचेहु=ठगना, छल करना) (अपकार=अहित, अनिष्ट, अत्याचार)
भगवान ने कहा नारद ये तीनो श्राप नहीं ये तो वरदान आपका आशीर्वाद  है!

बड़ें भाग मानुष तनु पावा। सुर दुर्लभ सब ग्रंथन्हि गावा॥

दूसरा हमने तो आपका विवाह ही नहीं होने दिया आपके वरदान अनुसार मेरा कम से कम विवाह तो होगा तीसरा संसार में विपत्ति के समय जब कोई साथ नहीं देता तब कम से कम बंदर तो साथ रहेंगे !
अतःमेरे लिए तो  ये तीनो वरदान ही है।


राम अवतार के कारण NEXT

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