मेरा मुझ में कुछ नहीं,जो कुछ है सो तोर ।
तेरा तुझकौं सौंपता, क्या लागै है मोर ॥
कबीर कह रहे हैं कि अगर आपको अपना बड़प्पन रखना है तो सदैव छोटे बनकर रहो।छोटा बनने का अर्थ है विनम्र बनकर रहो।विनम्रता रखने में ही आपका बड़प्पन है।विनम्रता से आपका सभी लोगों में मान बढेगा। लघुता से ही प्रभुता मिलती है। प्रभुता से प्रभु दूर अर्थता अहंकार की भावना रखने से आपके और परमात्मा के मध्य की दूरी बढ़ जाएगी।अहँकार के कारण ही मनुष्य से परमात्मा दूर हो जाते हैं। कुछ करने और जानने का अहंकार आपको परमात्मा को पाने से वंचित कर देता है। चींटी छोटी है,विनम्र है इसलिए उसे शक्कर मिलती है। हाथी को अपने विशालकाय और बलशाली होने का अहंकार होता है। इसी बल के अहंकार के कारण वह सूंड से धूल उठाकर अपने सिर पर डालता रहता है।कहने का अर्थ है कि जीवन में कभी भी किसी भी विशेषता का अभिमान नहीं करना चाहिए। विनम्रता आपको शिखर तक ले जा सकती है और अहंकार पतन के अंधकार तक, चयन आपको करना है। परमात्मा के द्वार तक दंडवत लेट कर ही पहुंचा जा सकता है,अहंकार से अकड़कर चलने पर तो उसका दर तक दिखलाई नहीं पड़ेगा।
लघुता ते प्रभुता मिले, प्रभुता ते प्रभु दूरी।
चींटी लै सक्कर चली, हाथी के सिर धूरी।।
तुलसीदास जी ने कहा हे श्री रघुबीर! मेरे समान कोई दीन नही है और आपके समान कोई दीनो का हित करनेवाला नही है। ऐसा विचार कर हे रघुवंशमणि! मेरे जन्म मरण के भयानक दुख का हरण कर लीजिये। (बिसम= विकट, भीषण, प्रचंड भयंकर विकट) (भव भीर= जन्म मरण)
मों सम दीन न दीन न हित, तुम समान रघुवीर।
अस विचारि रघुवंश मनि, हरहु बिसम भव भीर।
तीनि लोक तिहुँ काल जस चातक ही कें माथ ।
तुलसी जासु न दीनता सुनी दूसरे नाथ ।।
तुलसीदास जी ने कहा मुझको अपना दास जानकर कृपा की खान आप सब लोग मिलकर छल छोड़कर कृपा कीजिए। (छोह= कृपा) (कृपाकर= कृपा+ आकर=कृपा की खानि) दूसरा (कृपा+कर= कृपा करनेवाले) (किंकर= दास, सेवक)
जानि कृपाकर किंकर मोहू। सब मिलि करहु छाड़ि छल छोहू॥
सब जगत को सियाराम मय मानकर वंदना की और अपने में किंकर,भाव रखा यह गोस्वामी जी का अनन्य भाव है यथा
सो अनन्य जाकें असि, मति न टरइ हनुमंत।
मैं सेवक सचराचर, रूप स्वामि भगवंत।।
मुझे अपने बुद्धि-बल का भरोसा नहीं है, इसीलिए मैं सबसे विनती करता हूँ।
निज बुधि बल भरोस मोहि नाहीं। तातें बिनय करउँ सब पाहीं॥
आगे अपने को संतो का बालक कहा,
छमिहहिं सज्जन मोरि ढिठाई। सुनिहहिं बालबचन मन लाई।।
तुलसीदास जी ने कहा। मैं न तो कवि हूँ, न वाक्य रचना में ही कुशल हूँ,मैं तो सब कलाओं तथा सब विद्याओं से रहित हूँ, इनमें से काव्य सम्बन्धी एक भी बात का ज्ञान मुझमें नहीं है यह मैं कोरे कागज पर लिखकर(शपथपूर्वक)सत्य-सत्य कहता हूँ। वेजनाथ के अनुसार कि अपने मुँह अपनी बड़ाई करना दूषण है।अपनी बड़ाई करने वाला लघुत्व को प्राप्त होता है। अतः यहाँ यह चतुरता गोसाई जी ने की कि काव्य के सर्वाग प्रथम गिना आए, फिर अंत में कह दिया कि हममें एक भी काव्यगुण नहीं हैं। जैसे पूजन कर अंत में अपराध निवारण हेतु प्रार्थना की जाती है, वैसे ही यहाँ जानिये।
कवि न होउँ नहिं बचन प्रबीनू।सकल कला सब बिद्या हीनू।।
कवित विवेक एक नहिं मोरे।सत्य कहउँ लिखि कागद कोरे।।
गोस्वामी जी सब गुणों से पूर्ण होते हुए भी ऐसा “कवि न होउँ” कह रहे है इन्होने तो विनम्रता की हद ही पार कर दी यह कार्पण्य यानि दीनता अथवा चित् का गर्वहीन भाव को कार्पण्य शस्णागति कहते है! जैसे हनुमानजी भक्ति के पूर्ण ज्ञाता हैं,फिर भी शपथ करके कहा है, ऐसा कहकर अपने हृदय की निष्कपटता दर्शित करता है।यथा
ता पर मैं रघुबीर दोहाई।जानउँ नहिं कछु भजन उपाई।।
आप यह यथार्थ भी कह रहे हैं।
जदपि कबित रस एकउ नाहीं। राम प्रताप प्रगट एहि माहीं॥
राम प्रताप क्या है।
जिन्ह के जस प्रताप कें आगे। ससि मलीन रबि सीतल लागे।।
चला रुधिर रघुनायक जाना। सींक धनुष सायक संधाना॥
अतुलित बल अतुलित प्रभुताई। मैं मतिमंद जानि नहिं पाई।।
बान प्रताप जान मारीचा। तासु कहा नहिं मानेहि नीचा॥
श्री रघुबीर प्रताप ते सिंधु तरे पाषान।
ते मतिमंद जे राम तजि भजहिं जाइ प्रभु आन॥
समुझि राम प्रताप कपि कोपा। सभा माझ पन करि पद रोपा।।
तुलसीदास जी ने कहा -मेरी बुद्धि तो अत्यन्त नीची है और चाह बड़ी ऊँची है, चाह तो अमृत पाने की है, पर जगत में जुड़ती छाछ भी नहीं। जैसे बालक जब तोतले वचन बोलता है, तो उसके माता-पिता उन्हें प्रसन्न मन से सुनते है। (मुदित= प्रसन्न)
मति अति नीच ऊँचि रुचि आछी। चहिअ अमिअ जग जुरइ न छाछी॥
जौं बालक कह तोतरि बाता। सुनहिं मुदित मन पितु अरु माता॥
तुलसीदास जी ने कहा:-कीर्ति, कविता, और सम्पत्ति ,वही उत्तम है, जो गंगाजी की तरह सबका हित करने वाली हो। श्री रामजी की कीर्ति तो बड़ी सुंदर (सबका अनन्त कल्याण करने वाली ही) है, परन्तु मेरी कविता भद्दी है। यह असामंजस्य है (अर्थात इन दोनों का मेल नहीं मिलता) इसी की मुझे चिन्ता है। (भनिति= कविता, कहावत,लोकोक्ति) (अँदेसा= शक,संदेह, संशय,खटका, अविश्वास) (भदेसा= भद्दा, कुरूप,बुरा)
कीरति भनिति भूति भलि सोई। सुरसरि सम सब कहँ हित होई॥
राम सुकीरति भनिति भदेसा। असमंजस अस मोहि अँदेसा॥
तुलसीदास जी ने कहा-पशु, पक्षी, देवता, मनुष्य, असुर समेत जितने श्री रामजी के चरणों के उपासक हैं, मैं उन सबके चरणकमलों की वंदना करता हूँ, जो श्री रामजी के निष्काम सेवक हैं। (जे बिनु काम=निष्काम)
रघुपति चरन उपासक जेते। खग मृग सुर नर असुर समेते॥
बंदउँ पद सरोज सब केरे। जे बिनु काम राम के चेरे॥
तुलसीदास जी ने कहा-जो श्री रामजी के भक्त कहलाकर लोगों को ठगते हैं, जो धन (लोभ), क्रोध और काम के गुलाम हैं और जो (धींगाधींगी= बदमाशी,उपद्रव) करने वाले, धर्मध्वजी (धर्म की झूठी ध्वजा फहराने वाले दम्भी) और कपट के धन्धों का बोझ ढोने वाले हैं, संसार के ऐसे लोगों में सबसे पहले मेरी गिनती है। (भगत कहाइ-ऐसे लोगों को स्वयं को भक्त कहलाने की बड़ी इच्छा होती है) और जो वास्तव में भक्त हैं जैसे भरत जी, हनुमानजी आदि , ये कभी अपने को भक्त कहते ही नहीं हैं और न उन्हें किसी से कहलाने की इच्छा रहती है। हनुमानजी जामवंत जी तो बंदर भालू के वेष में हैं लेकिन उनके अंदर साधुता का वास है।
बंचक भगत कहाइ राम के। किंकर कंचन कोह काम के॥
तिन्ह महँ प्रथम रेख जग मोरी। धींग धरम ध्वज धंधक धोरी॥
(बंचक= ठग) (कंचन= धन,संपत्ति) (कोह= क्रोध, गुस्सा) (किंकर= गुलाम, दास,सेवक, नौकर) (रेख= गिनती) (धिग= घिकू= धिक्कार) (धरम ध्वज=धर्म का आडंम्बर खड़ा करके स्वार्थ साधन करने वाला पाखंडी) (धंधक= काम-धंथे का आडंम्बर,जंजाल) “तिन्ह महँ प्रथम रेख”अर्थात् जबसे कलियुग शुरू हुआ तब से आज तक जिनका जन्म हुआ “जग’ कहने का भाव यह है कि जगत् भर में जितने अधम हैं,उन सबों में प्रथम मेरी गिनती है। पुनः,भाव कि सत्ययुग में देत्य खल, त्रेता में राक्षस खल और द्वापर में दुर्याधन आदि जो खल थे,उनको नहीं कहते। जो कलियुग में जन्मे उनमें से अपने को अधिक कहा। क्योंकि कलि के खल तीनों से अधिक हैं।
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