सतीं मरत हरि सन बरु मागा।
पर्वती विवाह- शिव जी के मना करने पर भी सती जी अपने पिता दक्ष के घर गई और यज्ञ में शिव जी का भाग ना देखकर,अपने पिता दक्ष द्वारा शिव जी के अपमान सहन नहीं कर पाई परिणाम स्वरुप सती जी ने अपने दाहिने अगुष्ठ से योग अग्नि को प्रकट किया और स्वयं के शरीर को भस्म कर डाला और जाते जाते भगवान विष्णु से वरदान माँगा, और कहा प्रभु मुझे एक वरदान दीजिये कि में जब जब मेरा जन्म हो, भगवान भोले नाथ ही मेरे पति हो।
तेहि कारन हिमगिरि गृह जाई। जनमीं पारबती तनु पाई॥
इसी कारण माँ सती का अगला जन्म पार्वती के रूप में राजा हिमांचल के यहाँ हुआ।
रामचरित मानस में आप देखेंगे राम जी शिव जी का ध्यान आराधना करते है और शिव जी रामजी का ध्यान करते है दोनों देवता एक दूसरे के पूरक है दोनों ही एक दुसरे को स्वामी, सखा मानते है बाबा ने सुन्दर ही लिखा है (निरुपाधि=बाधा रहित, मायामोह रहित)
सेवक स्वामि सखा सिय पी के। हित निरुपधि सब बिधि तुलसी के॥
भगवान ने कहा की क्या अगले जन्म में भी दक्ष की बेटी बनोगी? तब सती जी ने कहा हे प्रभु चाहे पत्थर की बेटी बना देना पर दक्ष की बेटी मत बनना इसी कारण से
तेहि कारन हिमगिरि गृह जाई। जनमीं पारबती तनु पाई॥
जब तें उमा सैल गृह जाईं। सकल सिद्धि संपति तहँ छाईं॥
इसी कारण माँ सती का जन्म पार्वती के रूप में राजा हिमांचल के यहाँ हुआ जब यह समाचार नारद जी को मिला तो नारद जी राजा हिमांचल के यहाँ पहुंच गए, हिमांचल जी ने नारद जी को परम पुनीत आसन पर बिठाया पद प्रक्षालन किया पूजन किया भोजन कराया उसके बाद हिमांचल जी पार्वती को बुलाया और मुनि जी प्रणाम करवाया।
नारद समाचार सब पाए। कोतुकहीं गिरि गेह सिधाए॥
सैलराज बड़ आदर कीन्हा। पद पखारि बर आसनु दीन्हा॥
नारि सहित मुनि पद सिरु नावा। चरन सलिल सबु भवनु सिंचावा॥
निज सौभाग्य बहुत गिरि बरना। सुता बोलि मेली मुनि चरना॥
पद प्रक्षालन के जल को पूरे महल में छिड़कवाया, क्योंकि संतों के चरणों में सारे तीर्थो का निवास करते है हे मुनि आपके आगमन से हमारे भाग्य का आज उदय हुआ। (सलिल=पानी, जल)
सारे तीर्थ धाम आपके चरणो में।
हे गुरुदेव प्रणाम आपके चरणो में।।
हे मुनिवर! आप त्रिकालज्ञ और सर्वज्ञ हैं, आपकी पहुँच तो सर्वत्र है। अतः आप हृदय में विचार कर हमारी कन्या पार्वती के दोष बताये (सूत्र) हम और आप केवल अपने गुणों को ही सुनना पसंद करते है अगर कोई दोष बताये तो उसके बराबर कोई हमारा शत्रु नहीं होता जबकि प्रशंसा बहुत ही घातक होती है सबसे बड़ा हितेषी दोष बताने वाला ही होता है क्योकि उसके बताये दोष से हम और आप में सुधार करने की संभावना होती है।
त्रिकालग्य सर्बग्य तुम्ह गति सर्बत्र तुम्हारि।
कहहु सुता के दोष गुन मुनिबर हृदयँ बिचारि॥
देव रिषि नारद पार्वती जी का हाथ देखते है हे पर्वत राज आपकी कन्या पार्वती में सारे गुण है इसके तीन नाम होंगे उमा, अम्बिका और भवानी अतः तीन नामो से जानी जाएगी और इन्ही के नाम से लोग आपको भी जानेगे।
कह मुनि बिहसि गूढ़ मृदु बानी। सुता तुम्हारि सकल गुन खानी॥
सुंदर सहज सुसील सयानी। नाम उमा अंबिका भवानी॥
सब लच्छन संपन्न कुमारी। होइहि संतत पियहि पिआरी॥
तुम्हारी कन्या अपने पति को सदा प्यारी होगी। इसका सुहाग सदा अचल रहेगा और महाराज आप दोनों का यश होगा, आपकी कन्या नारियों में सर्वश्रेष्ठ होगी लोग इनकी पूजा करेंगे इसकी सेवा करने से संसार में कुछ भी दुर्लभ नही होगा।
सदा अचल एहि कर अहिवाता। एहि तें जसु पैहहिं पितु माता॥
होइहि पूज्य सकल जग माहीं। एहि सेवत कछु दुर्लभ नाहीं॥
एहि कर नामु सुमिरि संसारा। त्रिय चढ़िहहिं पतिब्रत असिधारा॥
सैल सुलच्छन सुता तुम्हारी। सुनहु जे अब अवगुन दुइ चारी॥
पर महराज पार्वती के अंदर गुण ही गुण है इसको जो पति मिलने वाला है उसमें तमाम अवगुण भरे हुए है अगर आपका आदेश हो तो आपको बताये राजा हिमांचल जी ने कहा अवश्य बतलाये अब नारद जी माँ पार्वती के भाग्य में जो वर लिखा है उसके दोष को बताते है।
अगुन अमान मातु पितु हीना। उदासीन सब संसय छीना॥
जोगी जटिल अकाम मन नगन अमंगल बेष।
अस स्वामी एहि कहँ मिलिहि परी हस्त असि रेख॥
नारद जी ने कहा पार्वती को जो पति मिलेगा उसमें तमाम अवगुण भरे हुए है 1 अगुण होगा कहने का अर्थ तीन गुण होते है सत रज तम इन तीनों गुणों से परे होगा पर हिमांचल जी को लगा कि उसके अंदर कोई गुण ही नहीं होगा 2 अमान होगा अर्थात मान सम्मान से परे होगा मान सम्मान की चिंता हम और आपको होती है और यही दुखों का मुख्य कारण भी है हम सभी की कल्पना तो मान सम्मान की होती है और जब पूरी नहीं होती तो बड़ा भारी दुख होता है पर शंकर जी तो मान सम्मान से परे है पर हिमांचल जी ने समझा की समाज में उसका कोई मान सम्मान नहीं होगा 3 उसके माता पिता नहीं होंगे विकराल वेश होगा नारद जी को सुन कर हिमांचल जी मैना जी और पार्वती तीनों की आखों में आंसू आ गए।
सुनि मुनि गिरा सत्य जियँ जानी। दुख दंपतिहि उमा हरषानी॥
नारदहूँ यह भेदु न जाना। दसा एक समुझब बिलगाना॥
पार्वती माँ इस लिए रो रही है कि मानों पूर्व जन्म में जो वरदान विष्णु जी से माँगा था आज वो वरदान पूरा हो रहा है अतः ख़ुशी के आंसू निकल रहे है लेकिन मैना मैया और हिमांचल जी इस लिए रो रहे है कि कितनी सुन्दर बिटिया है पर विधाता ने ऐसा वर लिख दिया।
झूठि न होइ देवरिषि बानी। सोचहिं दंपति सखीं सयानी॥
उर धरि धीर कहइ गिरिराऊ। कहहु नाथ का करिअ उपाऊ॥
हिमांचल जी नारद जी से उपाय पूछते है किस विधि से पार्वती के वर को बदला जाय नारद जी क्रोध में आ गये और हिमांचल जी कहा यह असंभव है में क्या स्वयं मेरे पिता ब्रम्हा भी इस होनी को टाल नहीं सकते हिमांचल जी ये बदलने वाला नहीं है। (सूत्र) महाराज विवाह तो पहले से ही तय होता है पर हम सभी को खोज कर उस तक पहुंचना पड़ता है वे वजह ही परेशान होकर अपना जीवन ना खराब करें जिसको जो मिल गया उसी में संतुस्ट रहना चाहिए।
कह मुनीस हिमवंत सुनु जो बिधि लिखा लिलार।
देव दनुज नर नाग मुनि कोउ न मेटनिहार॥
सुन्दर भजन-
जो विधि कर्म में लिखा विधाता, मिटाने वाला कोई नहींl
वक्त पड़े पर गज़ भर कपड़ा, देने वाला कोई नहींll
वक्त पड़ा राजा हरीशचंद्र पे, काशी जो बिके भाईl
रोहित दास को डसियो सर्प ने, रोती थी उसकी माईll
उसी समय रोहित को देखो, बचाने वाला कोई नहींl
वक्त पड़े पर गज़ भर कपड़ा, देने वाला कोई नहीं ll
जो विधि कर्म में लिखा विधाता, मिटाने वाला कोई नहींl
वक्त पड़ा देखो रामचंद्र पर, वन को गए दोनों भाईl
राम गए और लखन गए थे, साथ गई सीता माईll
वन में हरण हुआ सीता का, बचाने वाला कोई नहींl
वक्त पड़े पर गज़ भर कपड़ा, देने वाला कोई नहींll
जो विधि कर्म में लिखा विधाता, मिटाने वाला कोई नहींl
वक्त पड़ा अंधी अंधों पे, वन में सरवण मरन हुआl
सुन करके सुत का मरना फिर, उन दोनों का मरन हुआll
उसी श्राप से दशरथ मर गए, जलाने वाला कोई नहींl
वक्त पड़े पर गज़ भर कपड़ा, देने वाला कोई नहीं ll
जो विधि कर्म में लिखा विधाता, मिटाने वाला कोई नहींll
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सतीं मरत हरि सन बरु मागा। जनम जनम सिव पद अनुरागा॥